(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.22. अध्यायः 022
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
युधिष्ठिरंप्रत्यर्जुनवचनम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 12-22-0x(6097)(73905)
अस्मिन्नेवान्तरे वाक्यं पुनरेवार्जुनोऽब्रवीत्।
निर्विण्णमनसं ज्येष्ठमिदं भ्रातरमच्युतम्॥ 12-22-1(73906)
क्षत्रधर्मेण धर्मज्ञ प्राप्य राज्यं सुदुर्लभम्।
जित्वा चारीन्नरश्रेष्ठ तप्यते किं भृशं भवान्॥ 12-22-2(73907)
क्षत्रियाणां महाराज संग्रामे निधनं मतम्।
विशिष्टं बहुभिर्यज्ञैः क्षत्रधर्ममनुस्मर॥ 12-22-3(73908)
ब्राह्मणानां तपस्त्यागः प्रेत्य धर्मविधिः स्मृतः।
क्षत्रियाणां च निधनं संग्रामे विहितं प्रभो॥ 12-22-4(73909)
क्षात्रधर्मो महारौद्रः शस्त्रनित्य इति स्मृतः।
वधश्च भरतश्रेष्ठ काले शस्त्रेण संयुगे॥ 12-22-5(73910)
ब्राह्मणस्यापि चेद्राजन्क्षत्रधर्मेण वर्ततः।
प्रशस्तं जीवितं लोके क्षत्रं हि ब्रह्मसंभवम्॥ 12-22-6(73911)
न त्यागो न पुनर्यज्ञो न तपो मनुजेश्वर।
क्षत्रियस्य विधीयन्ते न परस्वोपजीवनम्॥ 12-22-7(73912)
स भवान्सर्वधर्मज्ञो धर्मात्मा भरतर्षभ।
राजा मनीषी निपुणो लोके दृष्टपरावरः॥ 12-22-8(73913)
त्यक्त्वा संतापजं शोकं दंशितो भव कर्मणि।
क्षत्रियस्य विशेषेण हृदयं वज्रसन्निभम्॥ 12-22-9(73914)
जित्वाऽरीन्क्षत्रधर्मेण प्राप्य राज्यमकण्टकम्।
विजितात्मा मनुष्येन्द्र यज्ञदानपरो भव॥ 12-22-10(73915)
इन्द्रो वै ब्रह्मणः पुत्रः क्षत्रियः कर्मणाऽभवत्।
ज्ञातीनां पापवृत्तीनां जघान नवतीर्नव॥ 12-22-11(73916)
तच्चास्य कर्म पूज्यं च प्रशस्यं च विशांपते।
तेनेन्द्रत्वं समापेदे देवानामिति नः श्रुतम्॥ 12-22-12(73917)
स त्वं यज्ञैर्महाराज यजस्व बहुदक्षिणैः।
यथैवेन्द्रो मनुष्येन्द्र चिराय विगतज्वरः॥ 12-22-13(73918)
मा त्वमेवं गते किंचिच्छोचेथाः क्षत्रियर्षभ।
गतास्ते क्षत्रधर्मेण शस्त्रपूताः परां गतिम्॥ 12-22-14(73919)
भवितव्यं तथा तच्च यद्वृत्तं भरतर्षभ।
दिष्टं हि राजशार्दूल न शक्यमतिवर्तितुम्॥ ॥ 12-22-15(73920)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मपर्वणि द्वाविंशोऽध्यायः॥ 22॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-22-1 अच्युतं धर्मात्॥ 12-22-4 त्यागः संन्यासः॥ 12-22-7 यज्ञ आत्ययज्ञः। समाधिरिति याव्नत्॥ 12-22-9 दंशितः सन्नद्धः॥ 12-22-11 ब्रह्मणः कश्यपस्य। नवतीर्नव दशाधिक शताष्टकम्॥ 12-22-12 इन्द्रत्वमैश्वर्यम्॥


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